नंबर वन की दौड़ है खतरनाक
प्रतिस्पर्धा की इस दौड़ ने देश का विकास कई हद तक किया है | आज हमारे मुल्क में सफलता के पैमाने बदल चुके है इस तस्वीर को बदलने में काफी वक़्त लगा है | स्वंतंत्रता के बाद से ही विकास के सभी दरवाजे एक - एक करके खुलने लगे भारत की बागडोर ऐसे हाथो में आई जिसने इसका आंतरिक ढांचा ही बदल कर रख दिया | और तभी से शुरू हुई सफल बन्ने की दौड़ आज तक थमने का नाम नहीं ले रही है , हमे बचपन से ही बहादुर बन्ने के लिए कहा जाता रहा है | और आज हिन्दुस्तान का बचपन पूरी तरह से जवान हो चूका है , लेकिन हमारी नौजवान नस्ल को सफल बन्ने की न जाने कौनसी धुन सवार है आज उनके सामने परिवार ,समाज ,नैतिकता जैसे शब्दों का कोई मतलब ही नही रह गया है | बस अगर कुछ उनकी जिंदगी में बाकी है तो वो है किसी भी तरह नंबर वन की कुर्सी पर काबिज़ होना है आज का युवा इस अंधी दौड़ में निरंतर दौड़ता हुआ नज़र आ रहा है | और यदि उस मुकाम को हासिल करने के लिए उन्हें अपने आदर्शो की बलि देनी पड़े तो वो ऐसा करने से भी गुरेज नहीं करते है , मेरी समझ में नहीं आता है की आखिर इंसान इस नंबर वन के लिए इतना उतावला किसलिए हो रहा है ? हम सभी जानते है की परिवर्तन जीवन का नियम है और कुछ भी स्थायी लम्बे समय तक नहीं रहता है | यह सत्ये है की इंसान बड़ा अपने विचारो , संस्कारों से ही बनता है , नंबर तो सिर्फ दिमागी फतूल है |
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