Thursday, 29 December 2011

delhi police erase this imaze.

                                  दिल्ली पुलिस बदले अपनी छवि.                                                                           .
 ग़ालिब का शहर दिल्ली आज भी इसकी खुशबु दूर दराज के परदेसियो को अपनी और खींच लेती है | शहर की वो तंग गलिया और दिल्लीवालो की बेबाक बोलने की अदा आज भी बरक़रार है | 
 वक़्त के साथ- साथ शहर ने भी करवट ली और विकास की दौड़ में शामिल हुआ | राजधानी ने ज़मीनी स्तर पर अनेक परिवर्तन किये चाहे वो शानदार पुलों का निर्माण या फिर बहुमंजिले ईमारत   एवं मेट्रो ने तो शहर की काया पलट कर धर दी | दिल्ली सरकार विकास की कसौटी पर सो फीसदी खरी उतरती है, लेकिन सुरक्षा की बागडोर सरकार ने ऐसे कंधो पर डाल दी है जिससे शहर की  आमजनता बात करते हुए भी घबराती है | दिल्ली पुलिस आज शहर के चप्पे चप्पे पर तैनात है और सुरक्षा की गारंटी देने का वादा करती है| लेकिन सिर्फ पुलिस की वर्दी पहन लेने से ये सिद्ध नहीं होता  आज हमारे बीच पुलिस की छवि इतनी ख़राब हो चुकी है की हम किसी वर्दीवाले से बात करना भी पसंद नहीं करते है | इसकी सबसे बड़ी वजह पुलिस का अड़ियल रवैया है जो नागरिको को अपनी  वर्दी का रोब दिखाकर आमजन की बोलती बंद कर देता है | शहर इन लोगो को कानून का दलाल , भड़वा न जाने कितने अनाप शनाप नामो से पुकारता है | ये सब सुन कर  पुलिस को तो कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन कानून की तोहीन बराबर होती है | पुलिस का ये खौफ अपराधियों के मन से तो निकलता जा रहा है और गुनेहगार निडर हो कर पुलिस की नाक के नीचे अपराध करते है | और अगर गलती से कोई चोर उचक्का पकड़ में आ जाता है तो अगले दिन चंद रुपए दे कर बहार आ जाता है और फिर से अपने धंदे में लग जाता है | पुलिस अपनी छवि से विपरीत दिशा में काम कर रही है , शहर की जनता से फ्रेंकली रवैया अपनाने से ही अपराध पर काबू पाया जा सकता है |
                                                                                 
                                                                                    
                                                                                   ( अमित आद्वंशी )

            

Tuesday, 27 December 2011

yog gives you long life

                                                                                     भोग से पहले योग..
 भारत आज वैश्विक स्तर पे भी अपनी कामयाबी का परचम लहरा चूका है | लेकिन खाने पीने के मामले में भी ये मुल्क किसी से पीछे नहीं रहा है | लेकिन पिछले वर्ष हुए कुछ सर्वे हमारे खाने पीने की गलत आदत को साफ़ दर्शाते है | मुल्क की राजधानी का अगर जिक्र करे तो आकड़े सब कुछ  बयान कर देते है आलम यह है की यहाँ हर तीसरा सक्ष ज्यादा खाने की आदत से बिमारी की गिरफ्त में आ रहा है | आकड़े बताते है की हमारे मुल्क  में ज्यादा खाना खाने से मरने वालो की संख्या दिन प्रतिदिन बड़ रही है | मधुमय रोग के पनपने का सबसे बड़ा कारण भी इसी में छिपा हुआ है |अमेरिका के राष्टपति ने कुछ वर्ष पूर्व कहा था की भारतीय खाने में ही सिर्फ ज्यादा ध्यान देते है | अगर हमे इन बढती बीमारियों से छुटकारा पाना है तो हमे अपने दिनचर्या में योग भी शामिल करना होगा | योग की शक्ति में लम्बी आयु का रहस्य छुपा है | निरोग बनाये रखने की ये सुलभ और सस्ती कुंजी है |

media has been defamed for politics

                                     मीडिया बदनाम हुई डार्लिंग तेरे  लिए                                                   
 तेरे चेहरे से नज़र नहीं हटती नज़ारे हम क्या देखे ....हिंदी फिल्म का ये गीत मीडिया की वर्तमान स्थिति पर फिट बैठता है |
 अगर आज हमारे मुल्क में सबसे ज्यादा कोई शक्तिशाली है तो वो है मीडिया  | बड़े से बड़े नेता अभिनेता के चेहरे पर 
 मीडिया का खोफ़ साफ़ नज़र आता है | समाज के हर पहलु पर मीडिया की पैनी नज़र रहती है . लेकिन मीडिया सिर्फ उन 
 खबरों को ज्यादा तवज्जो देता है जो मास के सामने राजनितिक मूल्यों से सरोकार रखती है |चाहे वो बड़बोले दिग्विजय सिंह
 के बयान हो या राहुल गाँधी का उत्तर प्रदेश में चुनावी प्रचार करना हो , हर खबर टी.वी चैनेलो   पर छाई रहती है | हमारे टी.वी 
 एंकर पुरे दिन एक ही खबर पर खेलते रहते है | कुछ ऐसी स्थिति ही प्रिंट की भी है अखबारों के फ्रंट पेज पर राजनितिक खबरों 
 को ही प्राकशित किया जाता है | और हमारे मुल्क की जनता इन खबरों पर अपनी भड़ास कुछ इस तरह से निकालती है ... सब
 नेता चोर है साले ... इस देश का कुछ नहीं हो सकता .. वास्तव में यही कटु सत्य है | आम जनता के दिल से नेताओ के लिए 
 यही शब्द निकलते है , पर अफ़सोस न तो इससे जनता को कोई फर्क पड़ता है और न ही मीडिया को | लेकिन मीडिया उन 
 खबरों पर प्रकाश सिर्फ तिनके भर ही  डालता जो देश की लाचारी , दलिद्रता , गरीबी , अत्याचार जात - पात को दर्शाती है |
 लेकिन इस सच्चई से मुह नहीं मोड़ा जा सकता की देश के कुछ हिस्सों में आज भी लोग एक दीपक के सहारे ही अपनी रात 
 काट देते है | मगर मीडिया तो इनसे कोसो दूर शहर के चाट भंडारों को दिखाने में मशगूल है . मीडिया आज राजनितिक 
 पार्टियों की भेट चढ़ चुकी है | हमारे राजनेताओ को तो सबकुछ मुहैया हो रहा ही लेकिन जिन लोगो को पेट भरने की लिए
 एक वक़्त की रोटी भी नसीब नहीं हो रही उन पर नज़र कौन रखेगा ?











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Thursday, 22 December 2011

why is keep mum sensor

                                                 सेंसर बोर्ड खामोश क्यों ?

 हिंदी फिल्म जगत में दर्शको तक फिल्म को पहुचाने में सेंसर बोर्ड का योगदान बहुत ही बड़ा है | हिंदी फिल्मो के हर एक पहलु पर बोर्ड की पैनी नज़र रहती है यदि कोई फिल्म का सीन 
 दर्शको की भावनाओ को ढेस पहुचाता है तो उस सीन पर तुरंत कैची चला दी जाती है | याद कीजिये युसूफ साहब की फिल्म नया दौर का वो सीन जब इसमें घोड़ो का इस्तेमाल लूट के 
 लिए किया जाता है ,इस सीन को भी बाहर का रास्ता देखना पड़ा था ताकि दर्शको पर किसी भी तरह का नकारात्मक प्रभाव न पड़े | इसके बाद भी फिल्म ने सफलता के कई मुकाम 
 हासिल किये और बी , आर चोपड़ा ने एक ऐसे नौजवान युवक को अभिनय का अवसर दिया जो आगे चल कर एक हिंदी सिनेमा का बहुत बड़ा अभिनेता बना | इसमें कोई शक नहीं है 
 की सेंसर बोर्ड शुरुआत से ही इमानदारी से अपने कर्तवे का पालन करता आ रहा है | लेकिन जब मेरी नज़रे पिछले दस सालो में रिलीज़ होने वाली कुछ फिल्मो पर पड़ती है तो  बोर्ड 
 सवालों के घेरे में खड़ा हो जाता है | फिल्मे समाज का आईना होती है और ये हमारी जीवन शेली के साथ साथ विचारधारा को भी प्रभावित करती है | आज की नए दौर की फिल्मो ने 
 अश्लील संवादों का भी चलन जोरो पर है और ये सब बोर्ड की नाक के नीचे हो रहा है | यहाँ तक की फिल्म की आत्मा कहा जाने वाले संगीत में गालियों का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया 
 जा रहा है , कुछ हिंदी हाल ही रिलीज़ फिल्मो की बात करे तो लगता है को बोर्ड ने अपनी आँखों  पर पट्टी बाँध के इनको देखा हो चाहे वो देल्ली बेल्ली हो या दिबाकर बनर्जी की लव सेक्स 
 और धोका हो सभी में सेक्स को खूब परोसा जा रहा है | बोर्ड सिर्फ अ लगा देने से अपना पल्ला नहीं झाड़ सकता है , जब कोई भी फिल्म दर्शको के बीच पहुचती है तो वे  सिर्फ सिनेमाघरों 
 तक सिमट कर नहीं रह जाती है | हम सब जानते है की हिंदी फिल्मो का बाज़ार कितना बड़ा है और आसानी से बच्चे भी इन फिल्मो को देखते है | यहाँ तक की मल्टीप्लेक्स के मालिक भी 
 अ श्रेणी की फिल्मो में अपने लालच के लिए बच्चो को ओडी में जाने की अनुमति देते है | जिससे की बच्चो पर गलत प्रभाव पड़ता है.. अगर ऐसी फिल्मो पर शीघ्र ही लगाम नहीं लगाई
 गयी तो समाज की स्थिति बहुत ही चिंता जनक हो जाएगी|  





















Tuesday, 20 December 2011


                                                 प्यार एक अपराध क्यों ?
 जब प्यार किया तो डरना क्या ........ जब प्यार किया तो फिल्म मुगले आज़म का ये गीत आज भी लोग अक्सर गुनगुनाते है | नौशाद साहब ने पूरी लग्न से इस 
 गीत को संगीतबद किया , वक़्त के साथ साथ गीत बदले तो हिंदी सिनेमा की आत्मा भी बदल गयी | लेकिन भारतीय समाज की सोच अभी नहीं बदली जिसके लिए 
 प्रेमी जोड़े न जाने कब से राह  देख रहे है | जिस देश में राम और सीता , कृष्ण और राधा की उपासना पूरी निष्ट एवं भक्ति भाव से होती है उसी देश में प्यार करने 
 वालो को मौत के घाट  उतार दिया जाता है न जाने क्यों हमारा  समाज ऐसे प्रेमी जोड़ो को स्वीकार नहीं करते जो एक दुसरे के साथ सात फेरो के बंधन मे बंधना चाहते है |
 मुगले आज़म ही नहीं बल्कि आज भी हमारे सामने इतने उदहारण है जिसने प्रेमी जोड़ियो को हमेशा के लिए एक दुसरे से जुदा किया |
 चाहे खाप पंचायत हो या अपने आप को कहने वाला सभ्य समाज दोनों के भीतर ही प्यार करने वालो के खिलाफ नफरत भरी है |
 जिस देश को आपसी भाईचारे प्रेम , एवं सदभावना के लिए पहचाना जाता है , उसी देश में दो प्यार करने वालो को सर छिपाने की 
 जगह भी नहीं मिलती है | घर,परिवार ,समाज उनका इतना बड़ा दुश्मन बन जाता है की मानो प्यार नहीं कोई उन्होंने कोई बहुत बड़ा अपराध 
 किया हो | बचपन से ही हमे सिखाया जाता है की सबसे प्यार से पेश आओ , आये दिन टी .वी ,अखबारों में बड़े बड़े संत महात्मा प्रेम पर व्याखान 
 देते हुए नज़र आते है | लेकिन जब ये प्यार उनकी गली मोहल्ले में परवान चड़ता है तो येही लोग उन्हें कोसना शुरू कर देते है | मैं पूछता हु की 
 आखिर कब तक समाज के ये ठेकेदार इन प्रेमी जोड़ो को जुदा करने का ये घिनोना काम करते रहेंगे | जब ये समाज प्यार का अर्थ ही नहीं जानता
  तो क्यों मंदिर में घंटी बजा बजा कर इश्वर के प्रति प्रेम का झूठा दिखावा करता है , आखिर कब तक हमारी पीड़ी अपने प्यार के लिए इस दिखावटी 
 समाज से लड़ती रहेगी | 
                                    
                                     देश की भारी चमक धमक के भीतर ही एक ऐसी सोच भी है जो कुंठित मानसिकता से पीड़ित है |
                                     ग़ालिब ने फ़रमाया था ये इश्क नहीं आसान बस इतना समाज लीजये, आग का दरिया है डूब के जाना 
 ग़ालिब की शायरी का वो दौर तो चला गया लेकिन प्रभाव जस का तस बना हुआ है | भारत आज विकास की उड़ान भर रहा है  लेकिन हमे 
 एक बार अपने भीतर उतर कर विचार करना पड़ेगा | समाज और इन्सान भी बड़ा अपनी सोच से बनता है न की अपनी झूटी शान से , प्रेम 
 परमात्मा की देंन है और इसी में ज़िन्दगी का सबसे बड़ा सुख है      

love cant be bounded


Monday, 19 December 2011

morality must

                                                                                                                                                                                                                                  नैतिकता जरुरी 
 मैं भी अन्ना तू भी अन्ना अब तो सारा देश अन्ना ,,,,,,,,,,, देश की अवाम ने इस नारे को इतना बुलंद किया की सत्ता पर काबिज़ हुई सरकार के होश उड़ गए | राजघाट से आरंभ हुई अन्नागिरी को  भारी जन समर्थन मिला , लाखो की तादाद में बच्चे बुड़े एवं महिलायों ने भी इस आन्दोलन को सफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी |इससे पहले भी हमारे देश में जमीन से जुड़े मुद्दों पर आन्दोलन  हुए है लेकिन इतने बड़े स्तर पर इस तरह का आन्दोलन हमने पहली बार देखा जिसने पूरे देश की जनता को एक साथ ला कर खड़ा कर दिया | लेकिन अन्ना इफ्फेक्ट इतने व्यापक स्तर पर होगा  इसकी किसी ने भी कल्पना भी नहीं की थी | जो लोग आन्दोलन का हिस्सा किसी वजह से नहीं बने थे उन्होंने अपने घर बैठे बैठे ही पल पल की जानकारी मीडिया एवं सोशल नेटवर्किंग साईट से प्राप्त  की | इस बीच लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली मीडिया ने बखूबी से अपना काम किया तथा अन्नागिरी को जनता तक पहुचाने में एक अहम भूमिका अदा की | पहले ही आमजन की कमर  मेहेंगी चीजों ने तोड़ दी थी इस दौरान सरकार को आड़े हाथो लेने का अच्छा मौका था और देश की जनता उसे खोना नहीं चहाती थी | लोकपाल बिल के समर्थन में देखते ही देखते अभिनेता से लेकर  नेता हर सक्श खुल कर अपनी बात रख रहा था | रामलीला मैदान में जो जन सैलाब हमे देखने  को मिला उसमे  सबसे महतवपूर्ण बात ये थी को इसमें महिलायों की संख्या  भी उतनी थी जितनी पुरुष की संख्या | सरकार के खिलाफ जनता का आक्रोश अपनी चरम सीमा पर था ये हम सबने देखा, लेकिन जन्लोक्पाल बिल को पास करवाने में रामलीला मैदान के मंच का प्रयोग   अभद्र भाषा के साथ नेताओ के खिलाफ भी किया जा रहा था  शायद मीडिया को छोड़ कर वहा किसी आम जन ध्यान गया ही नहीं , मैं पूछना चाहता हू जो नेता भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने आवाज़ उठा रहे है तो फिर इस तरह की शब्दावली को प्रयोग क्यों जनाब ? सबसे पहले तो आपको अपना आचरण ही साफ़ रखना है ना | जरा सोचिये जहा इतने बड़े बड़े नेताओ का आचरण ही ऐसा है तो आमजन से हम भ्रष्टाचार को समाप्त करने की कितनी उम्मीद कर सकते है | जिस देश में हर छोटे छोटे विभाग की नीव ही भ्रष्टाचार से पड़ी हो वहा हम सिर्फ एक बिल के पास करवा लेने से क्या हासिल कर लेंगे | इस सवाल की तरफ किसी का धयान ही नहीं गया क्या इसके बाद भ्रष्टाचार हमारे देश से चला जायेगा ? जब तक हम अपने भीतर छुपे एहंकार और भ्रष्ट  आचरण को नहीं  मार देंगे तब तक देश को हम इससे मुक्त नहीं करा सकते | शुरुआत हमे खुद से करने की जरुरत हैं लेकिन जिस जन्लोक्पाल बिल को लेकर बीते कुछ दिन पूर्व हाय तौबा हो रही थी वहा नैतिकता का कही भी जिक्र नहीं था |                               अमित आद्वंशी 

Saturday, 17 December 2011

sex education essential in india


                                                          सेक्स एजुकेशन जरुरी
 हाल ही में मुंबई की 15 वर्षीय स्कूल की छात्रा ने प्रेग्नेंट होने के बाद बच्चे को जन्म  देने का फैसला किया है | इस केस ने एक बार फिर से देश में चर्चाओ का माहोल गरम बना दिया है |
 आखिर टीनएज में प्रेग्नेंट होना कितना उचित है ? इस तरह की घटनाये अक्सर हमे विदेशो में देखनो को मिलती थी| इतना ही नहीं वहा तो प्रत्येक स्कूल एवं कॉलेज के साथ ही जच्चा
 बच्चा केंद्र भी स्थापित होते है | पश्चिम से बहने वाली इस हवा न देश की सीमायों में कब प्रवेश किया किसी को पता ही नहीं चला , नेतिकता के पतन का सबसे  बड़ा कारण भी हमारे
 देश में पश्चिमी जीवन शेली की ही देंन है | हिंदी सनेमा में भी शादी से पहले प्रेग्नेंट होने की अवस्था को बखूबी से परदे पर फिल्माया गया है  लेकिन हमे वही दिखाया  जाता है  जो सच से
 बहुत दूर होता है किस तरह लड़की अपने बच्चे को जन्म देने के लिए अपने घर परिवार समाज से लड़ती हुई उसको इस दुनिय का हिस्सा बनाती है | लेकिन वास्तविक  जीवन में ऐसा बहुत
 कम देखने को मिलता है  हमारा समाज संस्कार रीती रीति रिवाजों पर चलता है इसके बिना समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती है | लेकिन आज समय बहुत तेजी से बदल रहा है
 मुल्क की बागडोर नौजवान पीड़ी के हाथो में है | आज देश विकास की राह पर है हर जगह हमने कामियाबी के झंडे गाड़ दिए है चाहे वो विज्ञान प्रोदोयोगिकी हो या कला पूरे विश्व में हमारी एक
 अलग पहचान बन गयी है | आज हम किसी भी विषेय पर बात करने से नहीं कतराते राजनीति , भूगोल , महगाई , गरीबी हर विषेय पर खुल कर बेखोफ बात करते है | जैसे ही हमारे कानो
 में सेक्स शब्द सुनाई देता है तो हम उस पर बात करने से परहेज करते है | कुछ लोग तो हमारे देश में सेक्स के शाब्दिक अर्थ को भी नहीं जानते है इसको केवल कामोइछा से जोड़ कर देखते है |
जबकि हम अच्छी तरह से परिचित है की सेक्स हमारे जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा है , इस समस्या को रोकने का सबसे बड़ा तरीका सेक्स एजुकेशन के माध्यम से बच्चो को जागरूक करना जरुरी
है|                                 

                                                            
                                                                                                         लेकिन हमे अपनी सोच को थोडा सा इसके प्रति बदलने की जरुरत है  ऐसे केसेस बढने का सबसे बड़ा कारण  आज भी हमारे देश में सेक्स को टेबू समझना है  | ऐसे में बच्चो के लिए सेक्स एक सस्पेंस लम्बे समय तक बना रहता है , आज हमारे दैनिक जीवन में फिल्म , अख़बार यहाँ तक कि रिअलिटी शो में
भी सेक्स खूब परोसा जा रहा है | अक्सर हम अपने बच्चो के सामने बात तो दूर बल्कि इस शब्द को भी सुनना पसंद नहीं करते है और ऐसा करके कही न कही हम अपने परेशानियों को ही आमंत्रित
करते है | हमे बच्चो को हर स्तर पर  जागरूक बनाना चाहिए | इसके बारे में हम अपने बच्चो से खुल कर बात करे वरना इस तरह के केसेस दिन प्रतिदिन बड़ते जायेंगे |


                                                                                                                                                                                                                          अमित आद्वंशी

Friday, 16 December 2011

                                                                           आखिर ये बेशर्मी मोर्चा क्यों ?
हमारे देश में इन दिनों सभी लोग बेशर्मी मोर्चे पर अपनी अपनी प्रतिक्रया दे रहे है | टोरंटो से शुरू हुई इस मुहिम ने हमारे लोगो को भी सोचने पर मजबूर 
किया है | हम लोकतांत्रिक देश का हिस्सा है और हमे पूरा आधिकार है अपने विचारो को जनता के समक्ष रखने का | लेकिन हम हमेशा विदेशी विचारधाराओ
अपनाने के लिए क्यों तैयार रहते है ? कभी कुछ नया करने का प्रयास क्यों नहीं करते , अगर नज़र डाले तो हमारे आस पास की तमाम चीजे विदेशी मानसिकता
देन है | इसमें कोई शक नहीं है कि हमारे देश में बुधिजीवियो की संख्या अपार है लेकिन आश्चार्य जब होता है जब ये लोग भी भीड़ का हिस्सा बन कर विदेशी
मानसिकता की भेट चढ़ जाते है | और अंधी दौड़ में शामिल हो जाते है | मैं स्ल्ट शब्द के बिलकुल खिलाफ नहीं हू अगर महिलायों को लगता है  कि स्ल्ट वाक से
वे अपने आप को शहर में सुरक्षित महसूस करेगी तो उन्हें ऐसा जरुर करना चाहिए | लेकिन जरा सोचिये जिस देश में प्रतिदिन बलात्कार कि घटनाओ का ग्राफ
निरंतर बढता जा रहा हो , वहा एक दिन के अभियान से क्या कोई फर्क पड़ेगा ?

 वास्तव में दिल्ली पुलिस चोकसी बड़ाने समर्थ न हो लेकिन महिलायों को भी
अपनी तरफ से थोडा सा अलर्ट रहना चाहिए | कुछ महिनो पूर्व दिल्ली के कमिश्नर बी .के गुप्ता ने कहा था कि आधी रात में महिलायों को सड़क पर निकलना लाज़मी नहीं
है | लेकिन इस बयांन के तुरंत बाद ही वे विवादों से घिर गए , लेकिन मैं पूछता हू क्या गलत  कहा उन्होंने हमारे देश में स्वंतंत्रता का अधिकार सभी को प्राप्त है| लेकिन अगर
आप इसके अर्थ को न समझते हुए अतार्किक  तर्क देना वाजिब नहीं है | इस बात को हम भली भाति  समझते है कि दिल्ली पुलिस हर पल महिलायों पर नज़र नहीं रख सकती है |
बेहतर है कि महिलाये ऐसी परिस्थिति में पुलिस कि मदद करे एवं अपने आप को जागरूक बनाये | अक्सर सुनने में आता है कि अपने ऊपर हो रहे अत्याचार को महिलाये छुपा
लेती है , पुलिस स्टेशन जाना तो दूर अपने घर के सदस्यों को भी कुछ नहीं बताती है | लेकिन मीडिया जिस तरह से पिछले कुछ वर्षो से ज्यादा सक्रिय रहा है उसने लोगो को सच से रूबरू और अधिक जागरूक बना दिया है| 
            मैं दिल्ली विश्वविधालय कि छात्र उमंग सबरवाल कि प्रशंसा करता हू कि इस मुहिम के माध्यम से महिलायों को एक जुट
होने का मौका दिया लेकिन वो इसके साथ महिलायों को पुलिस प्रशासनिक जानकारी एवं साहसी बन्ने को प्रेरित करती तो ज्यादा बेहतर होता |                (अमित आद्वंशी)