सेंसर बोर्ड खामोश क्यों ?
हिंदी फिल्म जगत में दर्शको तक फिल्म को पहुचाने में सेंसर बोर्ड का योगदान बहुत ही बड़ा है | हिंदी फिल्मो के हर एक पहलु पर बोर्ड की पैनी नज़र रहती है यदि कोई फिल्म का सीन
दर्शको की भावनाओ को ढेस पहुचाता है तो उस सीन पर तुरंत कैची चला दी जाती है | याद कीजिये युसूफ साहब की फिल्म नया दौर का वो सीन जब इसमें घोड़ो का इस्तेमाल लूट के
लिए किया जाता है ,इस सीन को भी बाहर का रास्ता देखना पड़ा था ताकि दर्शको पर किसी भी तरह का नकारात्मक प्रभाव न पड़े | इसके बाद भी फिल्म ने सफलता के कई मुकाम
हासिल किये और बी , आर चोपड़ा ने एक ऐसे नौजवान युवक को अभिनय का अवसर दिया जो आगे चल कर एक हिंदी सिनेमा का बहुत बड़ा अभिनेता बना | इसमें कोई शक नहीं है
की सेंसर बोर्ड शुरुआत से ही इमानदारी से अपने कर्तवे का पालन करता आ रहा है | लेकिन जब मेरी नज़रे पिछले दस सालो में रिलीज़ होने वाली कुछ फिल्मो पर पड़ती है तो बोर्ड
सवालों के घेरे में खड़ा हो जाता है | फिल्मे समाज का आईना होती है और ये हमारी जीवन शेली के साथ साथ विचारधारा को भी प्रभावित करती है | आज की नए दौर की फिल्मो ने
अश्लील संवादों का भी चलन जोरो पर है और ये सब बोर्ड की नाक के नीचे हो रहा है | यहाँ तक की फिल्म की आत्मा कहा जाने वाले संगीत में गालियों का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया
जा रहा है , कुछ हिंदी हाल ही रिलीज़ फिल्मो की बात करे तो लगता है को बोर्ड ने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध के इनको देखा हो चाहे वो देल्ली बेल्ली हो या दिबाकर बनर्जी की लव सेक्स
और धोका हो सभी में सेक्स को खूब परोसा जा रहा है | बोर्ड सिर्फ अ लगा देने से अपना पल्ला नहीं झाड़ सकता है , जब कोई भी फिल्म दर्शको के बीच पहुचती है तो वे सिर्फ सिनेमाघरों
तक सिमट कर नहीं रह जाती है | हम सब जानते है की हिंदी फिल्मो का बाज़ार कितना बड़ा है और आसानी से बच्चे भी इन फिल्मो को देखते है | यहाँ तक की मल्टीप्लेक्स के मालिक भी
अ श्रेणी की फिल्मो में अपने लालच के लिए बच्चो को ओडी में जाने की अनुमति देते है | जिससे की बच्चो पर गलत प्रभाव पड़ता है.. अगर ऐसी फिल्मो पर शीघ्र ही लगाम नहीं लगाई
गयी तो समाज की स्थिति बहुत ही चिंता जनक हो जाएगी|
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